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‘था’ का ‘है’ में बदलाव: जीवन के शाश्वत सत्य का दर्शन

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अस्थिरता की वास्तविकता

हमारे बीच से ओम अब जा चुके हैं, यह मेरे जीवन के कठिन और पीड़ादायक सत्यों में से एक है। एक समय जो ‘है’ था, वह आज ‘था’ बन गया। हमारे जीवन का यही शाश्वत चक्र है, जिसमें कल, आज और कल के बीच के फासले हमें नित नए अनुभव, नए सच, और नए रिश्तों की ओर ले जाते हैं।

जीवन का शाश्वत चक्र

हमारा अस्तित्व समय और स्थान से गहराई से जुड़ा हुआ है। यही दो तत्व हमारे सुख-दुख, हमारे जन्म-मरण के अनेक किस्सों को गढ़ते हैं। ये कहानियाँ हमारी ज़िंदगी की पुस्तक बनाती हैं कि कैसे हम अपने परिवेश में अपनी पहचान बनाते हैं, और फिर एक दिन उसी में विलीन हो जाते हैं।

ब्रह्मांड की रचना

पूरे ब्रह्मांड की कहानी, जिसमें स्पेस और टाइम अपनी अनंत यात्रा में साथ-साथ रहते हैं और कभी अलग भी होते हैं, वह हमारी परिस्थितियों को आकार देती है। ये परिस्थितियां एक नगण्य समय में हमारी जिंदगी को परिभाषित करती हैं।

सांसारिक सत्य और शाश्वत सत्य

जगत अर्थात लगातार चलते रहने वाला – यही हमारी दुनिया की कहानी है। इसी कारण, हमारे पूर्वजों ने उपनिषदों में संसार के इस शाश्वत रहस्य को ‘जगत्यां जगत्‌’ के रूप में समझाया है। हमारे भीतर जो शाश्वत सत्य है, वह कभी नहीं बदलता, वह आत्मा है।

जीवन के नियमों का अर्थशास्त्र

श्रीकृष्ण ने गीता में बताया है कि आत्मा अविनाशी है जो न तो कभी कटती है और न ही जलती है। हमारा असली स्वरूप आत्मा है, जो नया शरीर धारण करती है।

शाश्वत सत्य की खोज

हमारे जीवन के सापेक्षिक सत्यों के पार जो निरपेक्ष सत्य है, वह ईश्वर है। ईशा उपनिषद के अनुसार, सभी जगत की चीज़ों में शाश्वत सत्य का अंश है और हमें इस धरती के संसाधनों को त्याग की भावना से इस्तेमाल करना चाहिए।

अंतत:, हमें अपनी अस्थिरिता के बीच इस शाश्वत सत्य को समझना है और उसे अपनाना है। हमारे ऋषि-मुनियों की यह शिक्षा न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए अमूल्य है, जिसे ईश्वर कहा जा सकता है। यह ज्ञान हमारे जीवन को अनंतता की गहराइयों से जोड़ता है।

(लेखक के विचार हैं और इन्हें किसी पुरस्कार या पहचान के साथ जोड़ा नहीं गया है)

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