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हिंदू-मुस्लिम आस्था की संगम स्थली: परनामी संप्रदाय जहां गीता और कुरान साथ पढ़ा जाता है

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परनामी संप्रदाय का परिचय

हमारा देश भारत अनेकानेक धार्मिक परंपराओं और संप्रदायों का घर है, जिनमें से कुछ काफी प्राचीन हैं तो कुछ नवीन परिकल्पना पर आधारित हैं। ऐसा ही एक अनोखा संप्रदाय है ‘परनामी’, जो हिंदू ग्रंथ गीता और मुस्लिम पवित्र पुस्तक कुरान को समान श्रद्धाभाव से पढ़ता है। इस संप्रदाय की विशेषता है इसकी सर्वधर्म समानता की नीति।

यह संप्रदाय भगवान कृष्ण के उपदेशों को सर्वोपरि मानता है और उन्हें सत्य का साकार रूप मानता है। परनामी परंपरा में धार्मिक ग्रंथों के प्रति गहरी आस्था और समर्पण देखने को मिलता है, चाहे वह हिंदू धर्म की भगवद् गीता हो या इस्लाम धर्म की कुरान।

महात्मा गांधी और परनामी संप्रदाय

महात्मा गांधी, जिन्हें भारत रत्न के रूप में जाना जाता है, की माता पुतली बाई भी इस परनामी संप्रदाय की अनुयायी थीं। गांधीजी ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में अपने परिवार के परनामी होने का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी मां प्रणामी संप्रदाय के मंदिर में नियमित रूप से जाती थीं, जहां पुजारी गीता और कुरान दोनों को बराबर महत्व देता था। संप्रदाय की इस विचारधारा से गांधीजी अत्यंत प्रभावित थे।

परनामी संप्रदाय की शिक्षा और आदर्श

परनामी संप्रदाय सच्चे मायने में अद्वैत का प्रतिपादन करता है, जिसमें सात्विक जीवन, परोपकार, जीवों पर दया, शाकाहार और नशामुक्ति पर बल दिया जाता है। संप्रदाय के अनुयायी सत्य, अहिंसा और प्रेम के संदेश को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं।

निजानंद संप्रदाय: हिंदू-मुस्लिम एकता की पहल

परनामी संप्रदाय को कभी-कभी ‘निजानंद संप्रदाय’ भी कहा जाता है। इसके अनुयायी भगवान ‘राज जी’ में अपनी गहरी आस्था रखते हैं। अनेक मुस्लिम भक्त प्राणनाथजी को ‘अंतिम इमाम महंदी’ के रूप में मानते हैं, तो वहीं कई हिन्दू भक्त उन्हें ‘निशकलंक कल्कि अवतार’ के रूप में। यह विचार संघर्ष की जगह समन्वय और सम्मिश्रण का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

परनामी संप्रदाय का वैश्विक विस्तार

परनामी परंपरा के अनुयायियों का मुख्य धार्मिक केंद्र मध्य प्रदेश के पन्ना शहर में स्थित है। फिर भी यह संप्रदाय गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और नेपाल में भी फैला हुआ है। भुलेश्वर में स्थित कृष्ण प्रणामी मंदिर इस संप्रदाय के अनुयायियों का स्वागत करता है और यहाँ भक्ति और श्रद्धा की एक अनूठी मिश्रित धारणा को देखा जा सकता है।

परनामी संप्रदाय के महत्वपूर्ण उत्सव

परनामी परंपरा में हर साल 12 नवंबर को एक भव्य उत्सव मनाया जाता है, जिसे ‘पारायण’ कहा जाता है। यह उत्सव एक नवंबर से शुरू होकर 12 नवंबर तक चलता है और इसमें विश्वभर से आए परनामी भक्त एकत्रित होते हैं। यह उत्सव धर्म, आध्यात्म और सामाजिक सद्भाव की भावना को बढ़ावा देता है और एकता की दिशा में एक कदम आगे बढ़ता है।

समाज में विविधता और एकात्मकता की मिसाल कायम करते हुए परनामी संप्रदाय ने एक अनूठी धारा प्रवाहित की है, जो धार्मिक सद्भाव और सम्पूर्णता का प्रतीक है। इसका संदेश है कि सत्य, प्रेम और करुणा की बुनियाद पर खड़ा कोई भी समाज सदैव फलता-फूलता है।

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